
देहरादून/ऋषिकेश, 08 अगस्त 2026
मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA) और उत्तराखंड प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी आदेशों के अनुपालन और राजनीतिक प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला प्रदीप दूबे के कथित अनधिकृत भवन निर्माण से जुड़ा है, जिसके विरुद्ध पत्रकार ईश्वर शुक्ला द्वारा मार्च 2025 से लगातार शिकायतें किए जाने का दावा किया जा रहा है।
दैनिक स्वतंत्र चेतना व उत्तराखंड भास्कर के पत्रकार ईश्वर शुक्ला के अनुसार, MDDA द्वारा उक्त भवन को सील करने के संबंध में अलग-अलग तिथियों में कुल पांच आदेश पारित किए गए। इन आदेशों में पुलिस क्षेत्राधिकारी, ऋषिकेश से भवन सील करने की कार्रवाई के दौरान पुलिस बल उपलब्ध कराने का अनुरोध भी किए जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद भवन को सील किए जाने की कार्रवाई अब तक पूरी नहीं हो पाने का दावा किया जा रहा है।
इसी बीच 4 अगस्त 2026 को पत्रकार ईश्वर शुक्ला के खिलाफ कोतवाली ऋषिकेश में रंगदारी मांगने के आरोप में मुकदमा दर्ज किए जाने से मामले ने नया मोड़ ले लिया है।
पत्रकार ईश्वर शुक्ला के अनुसार उन्होंने 26 मार्च 2025 को प्रदीप दूबे के कथित अनधिकृत निर्माण के संबंध में MDDA तथा अन्य उच्चाधिकारियों को पहली शिकायत भेजी थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया था कि लगभग 80 गज भूमि पर छह मंजिला भवन का निर्माण कथित रूप से बिना स्वीकृत नक्शे एवं आवश्यक अनुमति के किया जा रहा है।
इसके बाद MDDA में वाद संख्या R-339/2025 दिनांक 14 मई 2025 दर्ज किए जाने की बात सामने आई। बताया गया कि उक्त वाद कथित अनधिकृत निर्माणाधीन भवन को सील किए जाने की कार्रवाई से संबंधित है।
मामले में कार्रवाई की मांग को लेकर पत्रकार ईश्वर शुक्ला द्वारा 12 जून 2025 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल के मुख्य न्यायाधीश को भी प्रार्थना पत्र भेजे जाने की जानकारी दी गई है।
प्रार्थना पत्र में कथित अनधिकृत भवन निर्माण के संबंध में कानून के अनुसार कार्रवाई किए जाने की मांग की गई थी।
पांच बार सीलिंग आदेश—फिर भी भवन क्यों नहीं हुआ सील?
मामले का सबसे बड़ा सवाल MDDA के कथित सीलिंग आदेशों को लेकर है।
उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार अलग-अलग तिथियों में भवन को सील किए जाने के आदेश पारित किए गए—
20 मई 2026 — भवन को सील करने का आदेश।
23 जून 2026 — पुनः सीलिंग आदेश।
14 जुलाई 2026 — फिर सीलिंग का आदेश।
इसके अलावा दो अन्य आदेशों सहित कुल पांच बार भवन को सील किए जाने के आदेश पारित होने का दावा है।
हर बार पुलिस क्षेत्राधिकार से पुलिस बल मांगने का पत्र!
इस प्रकरण का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शुक्ला के अनुसार पांचों सीलिंग आदेशों के अनुपालन के लिए पुलिस क्षेत्राधिकारी, ऋषिकेश को पत्र भेजे गए।
पत्रों में MDDA की ओर से पुलिस क्षेत्राधिकारी से कहा गया कि प्राधिकरण को उक्त भवन को सील करने की कार्रवाई करनी है और इसके लिए पर्याप्त पुलिस बल उपलब्ध कराया जाए।
अर्थात प्राधिकरण की ओर से केवल सीलिंग का आदेश ही नहीं, बल्कि कार्रवाई के दौरान पुलिस सहायता उपलब्ध कराने के लिए भी पत्राचार किए जाने का दावा है।
इसके बावजूद यदि भवन सील नहीं हुआ है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कार्रवाई रुकी कहां?
पत्रकार ईश्वर शुक्ला का आरोप है कि प्रदीप दूबे और संदीप गुप्ता भाजपा से जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और उनके राजनीतिक प्रभाव के चलते कथित रूप से प्रशासनिक कार्रवाई प्रभावित हो रही है।
शुक्ला का आरोप है कि कथित अनधिकृत निर्माण के विरुद्ध शिकायतें किए जाने के बाद थाना कोतवाली ऋषिकेश के सब इस्पेक्टर के द्वारा शिकायतकर्ता को थाने में बुलाकर प्रदीप दुबे से समझौता करने और उनकी आवाज दबाने के लिए दबाव बनाने का प्रयास किया गया।
मामले ने उस समय नया मोड़ लिया जब 4 अगस्त 2026 को कोतवाली ऋषिकेश में पत्रकार ईश्वर शुक्ला के खिलाफ रंगदारी मांगने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया।
ईश्वर शुक्ला का आरोप है कि यह मुकदमा उन्हें जनहित के मुद्दे से पीछे हटाने और कथित निर्माण के मामले में आवाज उठाना बंद कराने के लिए दबाव बनाने की कोशिश का हिस्सा है।
हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होना अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता। रंगदारी के आरोप की सत्यता का निर्धारण पुलिस जांच, साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।
“मुकदमे से मेरी आवाज नहीं दबेगी”
पत्रकार ईश्वर शुक्ला का कहना है कि वह लंबे समय से जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं और आगे भी उठाते रहेंगे।
उनका कहना है कि किसी मुकदमे, दबाव अथवा धमकी के कारण वह जनहित के मुद्दों से पीछे नहीं हटेंगे।
शुक्ला के अनुसार यदि आवश्यकता पड़ी तो वह उत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल के समक्ष भी पूरे मामले में प्रशासनिक कार्रवाई की मांग रखेंगे।
अब MDDA की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
पूरे मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि MDDA के रिकॉर्ड में वास्तव में पांच सीलिंग आदेश पारित हुए और प्रत्येक कार्रवाई के लिए पुलिस बल उपलब्ध कराने को लेकर पुलिस क्षेत्राधिकारी को पत्र भेजे गए, तो फिर उन आदेशों का जमीन पर अनुपालन क्यों नहीं हुआ?
क्या किसी प्रशासनिक कारण से कार्रवाई रुकी?
क्या कोई न्यायिक आदेश बीच में आया?
क्या भवन के संबंध में कोई अन्य कानूनी प्रक्रिया लंबित है?
या फिर किसी प्रभाव के कारण कार्रवाई प्रभावित हुई?
इन सवालों का स्पष्ट उत्तर MDDA के आधिकारिक रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट से ही सामने आ सकता है।
सतत जागरण का सवाल
जब पांच बार भवन सील करने के आदेश जारी किए गए और पुलिस बल उपलब्ध कराने के लिए पत्र तक भेजे गए, तो भवन अब तक सील क्यों नहीं हुआ?
दूसरी ओर, जनहित में शिकायत करने वाले पत्रकार के खिलाफ 4 अगस्त को रंगदारी का मुकदमा दर्ज होने की परिस्थितियां भी निष्पक्ष जांच का विषय हैं।
कानून सभी के लिए समान है। यदि निर्माण वैध है तो जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए और यदि निर्माण नियमों के विपरीत है तो संबंधित प्राधिकरण को कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए। इसी प्रकार पत्रकार के खिलाफ लगाए गए रंगदारी के आरोप भी जांच और साक्ष्यों के आधार पर ही तय होने चाहिए।
सतत जागरण इस पूरे मामले में उपलब्ध सरकारी अभिलेखों, MDDA के आदेशों तथा संबंधित पक्षों के आधिकारिक पक्ष के आधार पर आगे भी तथ्यात्मक रिपोर्टिंग जारी रखेगा।



