सीलिंग के आदेश धरे रह गए, आखिर किसके रसूख में चलता रहा निर्माण?
भाजपा नेता प्रदीप दुबे के भवन पर कार्रवाई को लेकर एमडीडीए की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में


ऋषिकेश।
शहर में अवैध निर्माण के खिलाफ एमडीडीए की कार्रवाई को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जो प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। वीरभद्र रोड स्थित भाजपा नेता प्रदीप दुबे के निर्माणाधीन बहुमंजिला भवन को लेकर पूर्व में सीलिंग की कार्रवाई की जा चुकी है। शिकायतकर्ता के अनुसार इसके बाद भी निर्माण से संबंधित शिकायतें लगातार सामने आती रहीं और सीलिंग की कार्रवाई के लिए कई बार आदेश जारी होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी। अब एक बार फिर कार्रवाई होने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि आखिर पूर्व के आदेशों का पालन कराने में एमडीडीए क्यों नाकाम रहा?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब प्राधिकरण के आदेश के बावजूद किसी भवन की सीलिंग प्रभावी नहीं रह पाती तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? शिकायतकर्ता पत्रकार ईश्वर शुक्ला का आरोप है कि आम नागरिकों के छोटे-बड़े निर्माणों में नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर एमडीडीए तत्काल सीलिंग और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करता है, लेकिन भाजपा नेता से जुड़े इस भवन के मामले में कार्रवाई बार-बार टलती रही। शिकायतकर्ता का सवाल है कि क्या किसी राजनीतिक अथवा प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव के कारण अधिकारी कार्रवाई करने से बचते रहे? यदि ऐसा नहीं है तो बार-बार जारी आदेशों के बावजूद कार्रवाई न होने की वजह आखिर क्या रही?
पूर्व में प्रकाशित समाचार के अनुसार उक्त भवन को सितंबर 2025 में भी सील किया गया था। आरोप है कि बाद में सीलिंग के बावजूद निर्माण गतिविधियां जारी रहीं। वहीं इसी अवधि में आसपास के अन्य निर्माणों पर एमडीडीए की कार्रवाई भी हुई। ऐसे में एक ही प्राधिकरण के लिए नियमों के अनुपालन में यह दोहरा रवैया क्यों दिखाई दिया, यह सवाल अब स्थानीय लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
शिकायतकर्ता ईश्वर शुक्ला का कहना है कि उन्होंने भवन के संबंध में लगातार संबंधित अधिकारियों के समक्ष शिकायतें रखीं और कार्रवाई की मांग की। उनका आरोप है कि शिकायत करने के बाद 4 अगस्त को उनके खिलाफ ऋषिकेश कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराया गया, जबकि 7 अगस्त को न्यायालय ने उन्हें अग्रिम जमानत दे दी। शुक्ला का कहना है कि भवन संबंधी शिकायतों और उनके खिलाफ हुई कानूनी कार्रवाई के पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई और सीलिंग आदेशों के बावजूद निर्माण कैसे चलता रहा।
अब भवन पर दोबारा कार्रवाई के बाद मामला फिर सुर्खियों में है। एमडीडीए के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि पूर्व में जारी सीलिंग आदेशों का पालन कराने में किस स्तर पर चूक हुई और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई? यदि कोई राजनीतिक या बाहरी दबाव नहीं था तो कार्रवाई में हुई देरी का कारण सार्वजनिक होना चाहिए। वहीं यदि नियम सभी के लिए समान हैं तो आम नागरिक और प्रभावशाली व्यक्ति के निर्माण के मामले में कार्रवाई की गति में अंतर क्यों दिखाई दिया?
अब निगाहें इस बात पर हैं कि एमडीडीए केवल भवन को सील करने तक कार्रवाई सीमित रखता है या पूर्व के आदेशों के अनुपालन, कथित तौर पर जारी रहे निर्माण और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कर जवाबदेही तय करता है।



